क्यों संघर्ष कर रहा है सनातन धर्म या हिन्दू संस्कृति

क्या आपने कभी सोचा कि हिन्दू संप्रदाय या सनातन धर्म विश्व के प्राचीनतम धर्मो में से एक होने के बावजूद भी आज संघर्ष क्यों कर रहा है, आखिर क्यों इतने ढेर सारे धर्मो का प्रादुर्भाव हुआ, आखिर क्यों ना सारे मनुष्य सनातन धर्मी ही रहें, आखिर मुस्लिमो, ईसाइयो और अन्य धर्मो का प्रादुर्भाव क्यों हुआ?

हिन्दुओ ने ईश्वर को सिद्ध करने के लिए कभी प्रयत्न नहीं किया, क्योंकि वे कहते है कि वह तो एक युक्ति और एक उपाय मात्र है शरण में जाने के लिए। जब सर्वप्रथम ईसाई-मत और इस्लाम भारत में आया तो उसको घोर आश्चर्य हुआ कि हिन्दू लोग कैसे पागल है? कैसे मुर्ख है? कोई नदी को, कोई झाड़ को, तो कोई अनगढ़ पत्थर को पूज रहा है। कोई विचित्र आकृति वाले प्राणी कि पूजा कर रहा है। भला उनको क्या मालूम था कि हिन्दुओ ने बड़े गहन तत्व को खोज लिया है।

हिंदुत्व कहता है कि इसमें कोई अंतर नहीं पड़ता कि आप किसको पूज रहे हैं? किसकी पूजा कर रहे है – यह तो प्रश्न ही नहीं है, प्रश्न है कि आप पूजा कर रहे है, किसकी/किसको का महत्व नहीं है, महत्त्व है पूजा का, आप किसके सामने झुक रहे है – इसका कोई महत्व या मूल्य नहीं है, महत्व या मूल्य तो है – आपके झुकने का। बस इतना ही काफी है।

आप किसी पेड़ पौधे के सामने झुक जाइये, किसी बेडौल, अनगढ़ पत्थर पर सिंदूर पोतकर उसके सामने झुक जाइये या झुक जाइये किसी नदी के सामने, यह सब एक बहाना है, परमात्मा भी बहाना है, महत्व तो आपके झुकने का है ये सब आपके सहयोगी है और आपकी मदद करते है झुकने में। ऐसे झुकने से आप उस मूल को उस परमतत्व को पहचान लेंगे, बिना झुके उसे जानना या समझना संभव नहीं है। इसलिए विश्व को हिन्दू धर्म को समझने में बड़ी अड़चन हुई। अपने अनगढ़ रूप और रहस्यमता के कारण हिन्दू धर्म विश्व में सबसे काम समझा गया धर्म है, जहाँ तक इसके अनगढ़ होने का सवाल है, उसका कारण है और वह यह कि हिन्दुओ को एक बात समझ आगे कि ईश्वर महत्वपूर्ण नहीं है- महतवपूर्ण है – झुका हुआ और शरणार्थी साधक।

जहां शरण मिल जाए – जिसके माध्यम से मिल जाए – वह है या नहीं – यह भी गौण है। बस, शरण मिल जाए तो सब हो जाता है। फिर कुछ भी शेष नहीं रह जाता है। मान, सम्मान, मोह, माया, अहंकार सब कुछ समाप्त हो जाता है शरणागत भाव में, शायद इसलिए ही भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है …… “मामेकं शरणं व्रज”।।

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जय महाकाल।।
जय हो सत्य सनातन धर्म की।।

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