कैसे करते हैं मंत्र कार्य?

मंत्र केवल ध्वनि ही नहीं है। अपितु उसके मूल में स्वर व व्यंजनों में पूर्ण तत्व विद्यमान है। प्रत्येक मंत्र वर्णो के समूह से निर्मित होता है। प्रत्येक वर्ण में एक शक्ति तत्व व अस्तित्व होता है। मंत्र उच्चारण से एक विशिष्ट ध्वनि कंपन उत्पन्न होता है जो तुरन्त आकाश तत्व में मिलकर पूरे विश्व में, नहीं ब्रह्माण्ड में व्याप्त हो जाती है। मानों हम सूर्य के मन्त्रों का उच्चारण लयबद्ध तरीके से व विशिष्ट पद्धति से करते है।

उसके उच्चारण से एक विशिष्ट कम्पन्न उत्पन्न हुआ। वह सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त हो गई। वह ध्वनि सूर्य तक पहुँच गई। फिर वहाँ से टकरा कर लौट पड़ी। लौटते हुए उसमें सूर्य की शक्ति, तेजस्विता, कारकत्व विद्यमान हो जाते है। जो पुनः जातक के शरीर से टकरा कर उसमें सूर्य के गुण, कारकत्व व तेज भर देते हैं।

जिस प्रकार हम घर में रेडियों टी. वी. देखते है भारत में बैठे अमरीका, कनाड़ा, जापान को देखते व सुनते हैं।

मंत्र में शिव, शक्ति व आत्मा तीनों तत्वों का उचित सांमजस्यपूर्ण अस्तित्व होता है शिव निरापद है। शक्ति सानद्र है। शिव शक्ति के माध्यम से ही सृष्टि की रचना, स्थिति व संहार करता है। इन कृत्यों का आधार आत्मा होती है। शिव, शक्ति व आत्मा ये तीन ही तत्व सर्वोपरि है। मंत्र शिव व शक्ति के उचित सामंजस्य के कारण ही योग व मोक्ष दोनों गतियां देने में समर्थ है।

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