शमशान से लौटने पर नहाना क्यों जरूरी है?

जन्म और मृत्यु प्रकृति के अटल सत्यों में सबसे प्रमुख है। जीवन-मरण के फेर में इंसान तभी बंध जाता है जब ईश्वर उसकी रचना करता है। मनुष्य जीवन में 16 संस्कारों को समाहित किया गया है, जो जन्म के साथ शुरू होते हैं और मृत्यु पर्यंत साथ रहते हैं।


हिन्दू धर्म की बात करें तो यह एक ऐसा धर्म है जिसमें रीति-रिवाजों को भले ही परंपराओं का जामा पहनाया गया है लेकिन इनका अस्तित्व पूरी तरह विज्ञान के साथ-साथ भावनाओं से भी जुड़ा है।

जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु भी तय है। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि आत्मा अमर है, वह सिर्फ पुराना शरीर छोड़कर नया शरीर धारण करती है, आत्मा का ना आदि है और ना ही अंत।

आत्मा तो शरीर का साथ छोड़कर अपने परम पिता के पास चली जाती है, पीछे रह जाता है नश्वर शरीर। इस नश्वर शरीर को भी पंच तत्वों में विलीन कर दिया जाता है। हिन्दू धर्म में शव को श्मशान भूमि में जाकर अग्नि को समर्पित करने का विधान है।

हिन्दू धर्म में शवयात्रा में भाग लेना या शव को कंधा देना, दोनों को ही पुण्य कर्मों में रखा गया है। लेकिन एक बात और है जिसके अंतर्गत श्मशान में शव दाह के बाद घर आकर नहाना शामिल है। कभी आपने सोचा है ऐसा क्यों?

दरअसल जब आत्मा, शरीर का साथ छोड़कर चले जाती है तब शव आसपास मौजूद सूक्ष्म कीटाणुओं से ग्रसित हो जाता है। यह कीटाणु उन लोगों को भी अपने दायरे में ले लेते हैं जो शव के साथ उपस्थित होते हैं।

तंत्र शास्त्र के अनुसार श्मशान भूमि पर लगातार ऐसी क्रियाएं होती रहती हैं जिनके चलते वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहता है, वहां कुछ ऐसी शक्तियां उपस्थित होती हैं जो कमजोर मनोबल के लोगों पर अपना प्रभाव डाल सकती हैं।
इसलिए शवयात्रा से आकर स्नान करने को जरूरी करार दिया गया है।

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