किसे बनाएं गुरु, क्या है शिष्य की परिभाषा

ॐ शिवगोरक्ष योगी आदेश

।। पगलु वाणी ।।

पानी पीओ छान कर, गुरु बनाओ जान कर।

गुण मिले तो गुरु बनाओ चित्त मिले तो चेला। वरना पगलु तू घूम अकेला।।

गुरु से गुण लिए जाते है यदि शिष्य को लगता है कि गुरु में कोई अवगुण है तो उसको अनदेखा कर देना चाहिए। या फिर गुरु से स्वयं की दूरी बना लेना चाहिए ।

गुरु का कर्तव्य है अपने शिष्यों को सही मार्ग बताये, और शिष्य का प्रथम कर्तव्य है गुरु वचन को अपने जीवन का आधार बनाये ।

गुरु अवग्या या गुरु का अपमान करने वाला शिष्य पर गुरु द्रोह का दोष लगता है, और जिस पर गुरुद्रोह का दोष लग जाये उस शिष्य का साथ उसके इष्ट भी छोड़ देते है ।

गुरुद्रोह से मुक्ति का कोई अन्य उपाय नही सिर्फ पुनः गुरु कृपा ही है। गुरुमंत्र से बड़ा कोई मंत्र नही गुरु वचन से बड़ा कोई वाक्य नही गुरु सेवा से बड़ी कोई सेवा नही।

जो अपने गुरु का मज़ाक बनाता है उनकी निंदा करता उसकी तो ब्रह्म, विष्णु, महेश भी सहायता नही कर सकते। सारी सिद्धि, भक्ति व्यर्थ हो जाती है ।

जो गुरु का नही उसका इष्ट भी नही, और जो गुरु अपने अधर्मी शिष्य के अपराधों को अनदेखा करता है और उसका साथ देता है वो भी नरकगामी होता है।

साधु बनने के बाद जो साधु अपने घर-परिवार का मोह नही छोड़ पाता और जीवन यापन हेतु घर की सहायता लेता है वो अपने साथ अपने परिवार-कुल-पित्रो का भी पुण्य क्षय करके उनका लोक परलोक खराब कर देता है ।।

ये फकीरी नही आसान बस इतना समझ लीजिए। दुधारी तलवार है और नंगे पैर चलते जाना है।।

शिवगोरक्ष कल्याण करे।
शिवशक्ति भक्ति, शक्ति, मुक्ति, सद्बुद्धि दे ।
भैरव उस्ताद सदा सहाय ।।

आदेश😌

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