Opinion (विचार)

  • अवचेतन मन और उसकी शक्ति – भाग १

    न्यूटन ने गज़ब की खोजें की, आइंस्टीन ने अपनी खोजो से इतिहास रच दिया, गैलीलियो और उनकी खोजो के बारे में कौन नहीं जनता है, कभी आपने सोचने की कोशिश की कौन था उनकी खोजो और अविष्कारो के पीछे, ऐसे आविष्कार जिन्होंने सारी दुनिया को चमत्कृत कर दिया और विश्व को एक नयी क्रांति से अवगत कराया। ये सारा खेल उनके अवचेतन मन का था, जी हां सुनने में आपको अजीब जरूर लगेगा, लेकिन यही वो कटु सत्य है जिसके दम पर वो इन उचाईयो को छूने में कामयाब हो सके। (more…)

  • अवचेतन मन और उसकी शक्ति – भाग २

    जैसा की पिछले ब्लॉग में हमने अवचेतन मन की शक्तियों के बारे में बात की थी उसी कड़ी में आइये अब आगे बढ़ते है और कुछ और उदाहरण देखते है अवचेतन मन की शक्तियों के – (more…)

  • इन सात बातों का अवश्य रखें ख्याल

    अपनी किस्मत की कभी किसी से शिकायत नही करना क्योंकि आपको ईश्वर ने सब कुछ दिया है बस आपका नज़रिया गलत हुआ किस्मत नही। (more…)

  • किसे बनाएं गुरु, क्या है शिष्य की परिभाषा

    ॐ शिवगोरक्ष योगी आदेश

    ।। पगलु वाणी ।।

    पानी पीओ छान कर, गुरु बनाओ जान कर।

    गुण मिले तो गुरु बनाओ चित्त मिले तो चेला। वरना पगलु तू घूम अकेला।।

    गुरु से गुण लिए जाते है यदि शिष्य को लगता है कि गुरु में कोई अवगुण है तो उसको अनदेखा कर देना चाहिए। या फिर गुरु से स्वयं की दूरी बना लेना चाहिए । (more…)

  • Sadhak कैसे बन जाते हैं हम स्वयं के दुश्मन

    आज कल देखा जा रहा है एक फैशन से चल गया है भगवान को बदलने का पूजा करने की विधि विधान को बदलने का ।। वैसे तो हमारे सनातन धर्म के तीन मुख्य देवी देव है (more…)

  • Image कैसे मृत्य के पश्चात शरीर जलाना है अर्थपूर्ण?

    हिंदू जलाते हैं शरीर को। क्योंकि जब तक शरीर जल न जाए, तब तक आत्मा शरीर के आसपास भटकती है। पुराने घर का मोह थोड़ा सा पकड़े रखता है। तुम्हारा पुराना घर भी गिर जाए तो

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  • Image कौन होते हैं गुरु एवं क्या है गुरुमंत्र?

    गुरु का मतलब क्या है शिष्य कौन और क्या पुरक है? दोनो में गुरु का बोध शिष्य को हो तभी तो गुरु तत्व जाग्रत अवस्था मे आता है। बिना गुरु नाम का बोध हुये आप कैसे शिष्य हो ये हमे नही पता गुरु अपने आप में महा बीज मंत्र है गुरु किसी इंसान को कहा जाता है या नही ये आप की अवस्था पर निर्भर है।

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  • hindutva क्या अन्धविश्वास है तंत्र मंत्र?

    जैसे ही कोई व्यक्ति किसी तंत्रवेत्ता के सम्पर्क मे आता है तो साधारणतः अधिकतर व्यक्तियों की समझ या सोच होती है कि मैं तंत्र मंत्र के मार्ग पर प्रविष्ट हो गया हुं और मेरा तो अब एक अच्छे गुरु जी से भी संपर्क हो गया है और गुरु जी की कृपा भी मुझ पर है ही अतः अब तो सारी सिद्धियां मेरे बांए हाथ की मुट्ठी में होंगी, बहुत सारी लक्ष्मी की प्राप्ति होगी, मैं अपने शत्रुओं को चुटकी बजाते ही परास्त कर दुंगा मेरे सब शत्रु परास्त होंगे मैं उनको जैसा चाहूं वैसा दंड भी दे दुंगा। (more…)

  • क्या है ॐ के उच्चारण का रहस्य?

    ॐ को ओम लिखने की मजबूरी है अन्यथा तो यह ॐ ही है। अब आप ही सोचें इसे कैसे उच्चारित करें? ओम का यह चिन्ह ‘ॐ’ अद्भुत है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है। बहुत-सी आकाश गंगाएँ इसी तरह फैली हुई है। ब्रह्म का अर्थ होता है विस्तार, फैलाव और फैलना। ओंकार ध्वनि के 100 से भी अधिक अर्थ दिए गए हैं। यह अनादि और अनंत तथा निर्वाण की अवस्था का प्रतीक है।

    आइंसटाइन भी यही कह कर गए हैं कि ब्राह्मांड फैल रहा है। आइंसटाइन से पूर्व भगवान महावीर ने कहा था। महावीर से पूर्व वेदों में इसका उल्लेख मिलता है। महावीर ने वेदों को पढ़कर नहीं कहा, उन्होंने तो ध्यान की अतल गहराइयों में उतर कर देखा तब कहा।

    ॐ को ओम कहा जाता है। उसमें भी बोलते वक्त ‘ओ’ पर ज्यादा जोर होता है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं। यही है √ मंत्र बाकी सभी × है। इस मंत्र का प्रारंभ है अंत नहीं। यह ब्रह्मांड की अनाहत ध्वनि है। अनाहत अर्थात किसी भी प्रकार की टकराहट या दो चीजों या हाथों के संयोग के उत्पन्न ध्वनि नहीं। इसे अनहद भी कहते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड में यह अनवरत जारी है।

    तपस्वी और ध्यानियों ने जब ध्यान की गहरी अवस्था में सुना की कोई एक ऐसी ध्वनि है जो लगातार सुनाई देती रहती है शरीर के भीतर भी और बाहर भी। हर कहीं, वही ध्वनि निरंतर जारी है और उसे सुनते रहने से मन और आत्मा शांती महसूस करती है तो उन्होंने उस ध्वनि को नाम दिया ओम।

    साधारण मनुष्य उस ध्वनि को सुन नहीं सकता, लेकिन जो भी ओम का उच्चारण करता रहता है उसके आसपास सकारात्मक ऊर्जा का विकास होने लगता है। फिर भी उस ध्वनि को सुनने के लिए तो पूर्णत: मौन और ध्यान में होना जरूरी है। जो भी उस ध्वनि को सुनने लगता है वह परमात्मा से सीधा जुड़ने लगता है। परमात्मा से जुड़ने का साधारण तरीका है ॐ का उच्चारण करते रहना।

    त्रिदेव और त्रेलोक्य का प्रतीक :
    ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है- अ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है। यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है।

    बीमारी दूर भगाएँ : तंत्र योग में एकाक्षर मंत्रों का भी विशेष महत्व है। देवनागरी लिपि के प्रत्येक शब्द में अनुस्वार लगाकर उन्हें मंत्र का स्वरूप दिया गया है। उदाहरण के तौर पर कं, खं, गं, घं आदि। इसी तरह श्रीं, क्लीं, ह्रीं, हूं, फट् आदि भी एकाक्षरी मंत्रों में गिने जाते हैं।

    सभी मंत्रों का उच्चारण जीभ, होंठ, तालू, दाँत, कंठ और फेफड़ों से निकलने वाली वायु के सम्मिलित प्रभाव से संभव होता है। इससे निकलने वाली ध्वनि शरीर के सभी चक्रों और हारमोन स्राव करने वाली ग्रंथियों से टकराती है। इन ग्रंथिंयों के स्राव को नियंत्रित करके बीमारियों को दूर भगाया जा सकता है।

    उच्चारण की विधि : प्रातः उठकर पवित्र होकर ओंकार ध्वनि का उच्चारण करें। ॐ का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर कर सकते हैं। इसका उच्चारण 5, 7, 10, 21 बार अपने समयानुसार कर सकते हैं। ॐ जोर से बोल सकते हैं, धीरे-धीरे बोल सकते हैं। ॐ जप माला से भी कर सकते हैं।

    इसके लाभ : इससे शरीर और मन को एकाग्र करने में मदद मिलेगी। दिल की धड़कन और रक्तसंचार व्यवस्थित होगा। इससे मानसिक बीमारियाँ दूर होती हैं। काम करने की शक्ति बढ़ जाती है। इसका उच्चारण करने वाला और इसे सुनने वाला दोनों ही लाभांवित होते हैं। इसके उच्चारण में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है।

    शरीर में आवेगों का उतार-चढ़ाव :
    प्रिय या अप्रिय शब्दों की ध्वनि से श्रोता और वक्ता दोनों हर्ष, विषाद, क्रोध, घृणा, भय तथा कामेच्छा के आवेगों को महसूस करते हैं। अप्रिय शब्दों से निकलने वाली ध्वनि से मस्तिष्क में उत्पन्न काम, क्रोध, मोह, भय लोभ आदि की भावना से दिल की धड़कन तेज हो जाती है जिससे रक्त में ‘टॉक्सिक’ पदार्थ पैदा होने लगते हैं। इसी तरह प्रिय और मंगलमय शब्दों की ध्वनि मस्तिष्क, हृदय और रक्त पर अमृत की तरह आल्हादकारी रसायन की वर्षा करती है।

  • क्या है आत्मसाक्षात्कार?

    प्रायः सबकी दृष्टि आत्मसाक्षात्कार पर रहती है कि यह कैसे हो,इसके लिये क्या करना चाहिए?
    सच यह है कि आत्मसाक्षात्कार हरेक मे हर वक्त उपलब्ध है जरूरत केवल नि:संकल्प होने की है। (more…)

  • क्या है पूजा एवं अर्चना

    पूजा अपने इष्टदेव से सामीप्य का एहसास करने की एक सरल कर्मकांडीय विधि है। सरल लौकिक विचारों से संजोकर यह एक ऐसी अर्चना प्रणाली तैयार की गई है कि जो हमें कुछ समय के लिए इस सांसारिक जीवन की गतिविधियों से अलग हटाकर एक आध्यात्मिक संसार में पहुंचा देती है, जहां तन्मयता है, भावना है, पवित्रता का आभास है, विभोर और तृप्त कर देने वाला मनोभाव है।

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  • क्या है प्रारब्ध?

    एक व्यक्ति हमेशा ईश्वर के नाम का जाप किया करता था । धीरे धीरे वह काफी बुजुर्ग हो चला था इसीलिए एक कमरे मे ही पड़ा रहता था ।

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  • Hanuman क्या है भक्ति?

    ” भक्ति “

    कोई भी इंसान गुस्सैल नहीं होता, कोई भी इंसान कष्ट में या आनंद में नहीं होता, कोई इंसान प्रेम में या भक्ति में नहीं होता, लेकिन वह खुद को इनमें से किसी में भी विकसित कर सकता है। (more…)

  • Meditation क्या है मानव जीवन और क्या है साधक जीवन में भेद?

    आज कल देखा जा रहा है सब भेद बकरी बने हुए है जो सामने वाला करता है वही करना स्वम् को भी अच्छा लगता उसका निंर्णय क्या होगा हमारे प्रति सही या गलत इसका विचार तक नही करते है बस लगे हुए है करने किसी भी तरह हो जाये किन्तु कभी सोचा है ऐसा करने से 99 प्रतिशत आपके विपरीत ही कार्य होता है क्योंकि हर मनुष्य के कर्म ऊर्जा विचार सब अलग है तो ये कैसे संभव है इस सोच से स्वम् को हटाना होगा तभी कुछ प्राप्त होना संभव है (more…)

  • SHIV क्या है शक्ति एवं विश्वास

    भक्ति, श्रद्धा , विश्वास एवं धैर्य साधना मार्ग के चार स्तम्भ हैं। हमारी साधना का प्रतिफल इन्ही चार स्तम्भों पर निर्भर करता है। जो लोग ये कहते हैं की उन्हें मंत्रो से कोई लाभ नहीं मिला तो उन्हें समझ लेना चाहिए कि उनमे स्वयं ही कोई कमी है।

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  • Tantr क्या है सत्य आज के तांत्रिक शिविरों का

    आजकल एक चलन सा हो गया है तीन दिन मे, सात दिन मे दीक्षा का, आओ और तांत्रिक बन जाओ। कई तो इतने मास्टर है की दुसरो के शब्दो को कॉपी पोस्ट करके वाहवाही लूटते है। यह उस तरह का ही होता है जैसे अपना बच्चा तो है नही पडोसी के बच्चे को अपना बताना, (more…)

  • क्यों गर्भवती महिला को रहना होता है सतर्क ग्रहण से?

    भारत वर्ष में ग्रहण के लिए कई बातें बताई गई है, ग्रहण सदा से हमारे देश मे एक बुरी चीज मानी जाती रही है।गर्भवती स्त्रियों को घर से बाहर निकलने की मनाही सदैव ही रही है, आम जनमानस हेतु भी खाना और बनाना सदैव वर्जित रहा है, हमारी मान्यता के अनुसार ग्रहण काल मे ऐसा करने से गर्भस्थ शिशु के ऊपर बुरा प्रभाव पड़ता है।अब हम ये कैसे पता कर की ये मिथक है या सत्य? लोगो का ऐसा मानना है कि ग्रहण काल मे किये गए कई कार्य गर्भवती स्त्री और गर्भ में पल रहे गर्भस्थ शिशु के लिए हानिकारक है, आइए जानने की कोशिश करते है कि गर्भवती स्त्रियों को ले कर क्या क्या कार्य ग्रहण काल के दौरान वर्जित माने गए है –

    1. ऐसी मान्यता है कि यदि गर्भवती स्त्री ग्रहण काल मे बाहर निकलती है तो उससे गर्भस्थ शिशु के शरीर मे विकृतियां हो सकती है।
    2. ऐसी भी मान्यता है कि यदि गर्भवती स्त्री ग्रहण काल मे चाकू या कैंची का प्रयोग करती है तो गर्भस्थ शिशु के होंठ कटे फटे हो सकते है, या शरीर पर कोई निशान भी हो सकता है।
    3. ऐसी भी मान्यता है कि ग्रहण काल मे ना तो कुछ पकाना चाहिए और ना ही खाना, ये मान्यता सिर्फ गर्भवती स्त्री के लिए ही नही अपितु जन मानस हेतु मानी जाती है।
    4. ग्रहण काल मे कोई भी कार्य आरंभ ना करे, यथाशक्ति मंत्रो का जप करे, सोये ना।
    5. खिड़कियों पर पर्दे लगा कर रखे ताकि ग्रहण के समय की किरणें आप तक न पहुंच सके।

    ग्रहण के समाप्ति पर स्नान करनाऐसी कई मान्यताएं है जो आदि काल से हमारे साथ चली आ रही है, जिनमे जनमानस के साथ गर्भवती स्त्रियों के लिए विशेष सावधानियां बरतने की बात कही गई है, हालांकि इनमें से कुछ बातों को मानने में कोई बुराई नही है अंततः ये हमे और हमारे परिवार को सुकून ही पहुचाती हैं, जैसे कि आज का विज्ञान भी ये मानता है कि ग्रहण काल मे सूर्य या चंद्र को नंगी आंखों से नही देखना चाहिए, ऐसा करना से यदि आज नही, तो समय के साथ आपकी आंखें खराब हों सकती है, हालांकि सुरक्षा के साथ कोई भी ग्रहण को देख सकता है।

    वैसे भी गर्भवती स्त्री को आराम की ज्यादा आवश्यकता होती है तो क्यो ना रोजमर्रा के कामो से हटकर इस समय का लाभ उठाएं और आराम करते हुए भगवत भजन का लाभ उठाएं? सोने जाने से पहले स्नान शरीर को तरोताजा कर के सुकून की नींद लाने में मददगार होता है इसलिए ऐसा करने में हमारी नज़र में कोई बुराई नही है, हाँ ग्रहण काल मे खाने पीने का परहेज आप अपने हिसाब से करे क्योंकि ऐसा करने से आपके शरीर मे ग्लूकोज़ की मात्रा कम हो सकती है जो की गर्भस्थ शिशु और माँ दोनो के लिए हानिकारक है, हालांकि आज तक विज्ञान ने इन किदवंतियो को प्रमाणित नही किया है, लेकिन ऐसा भी नही है कि विज्ञान ने इन बातों पर शोध कर के इन्हें नकार दिया हो, इसलिए आपसे जो संभव हो करें, आखिरकार आपका परिवार आपकी और आपके गर्भस्थ शिशु की भलाई ही चाहता है इसलिए मान्याताओं को दरकिनार न करते हुए यथासंभव अपनी और अपने गर्भस्थ शिशु की सेहत का ध्यान रखे और ग्रहण काल मे बिना किसी जोखिम के स्वयं और अपने परिवार का ख्याल रखते हुए ग्रहण काल का भरपूर लाभ ले।

    जय महाकाल

  • जन्म के हिंदू मास से जानिए कैसे हैं आप?

    जिस माह में जन्मे हैं आप उस के गुण हैं आपमें

    ग्रहों, नक्षत्रों, वारों, तिथियों आदि के आधार पर मनुष्य का भविष्य फल बनाया जाता है। इनमें मासों का भी महत्वपूर्ण स्थान है। मासों की संख्या 12 है। मासों का प्रारंभ चैत्र मास से होता है। (more…)

  • Think Positive नसीयत जो बनाये जीवन सफल

    बहुत सुंदर कथा ..

    एक औरत अपने परिवार के सदस्यों के लिए रोज़ाना भोजन पकाती थी और एक रोटी वह वहाँ से गुजरने वाले किसी भी भूखे के लिए पकाती थी..। (more…)

  • भारतीय संस्कृति की परिभाषा

    समूह-जीवन जीव को एक नयी चेतना देता है। इसलिए ही आदिकाल से मानव, पशु, पक्षी, आदि समूह मे रहकर जीवन जीते आये हैं। उनमें भी मानवसमूह विशिष्टï है।

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  • शाबर मंत्र सिद्धि रहस्य

    शाबर मंत्र सिद्धि करने से पहले एक बार इस पोस्ट को अवश्य पढ़ें

    शाबर मंत्र के विषय मे पता नही वो कौन सा महाज्ञानी रहा होगा जिसने ऐसा लिखा है कि मंत्र जैसा जिस भाषा मे लिखा है उसे वैसा ही पढ़े किसी भी प्रकार का मंत्र में संशोधन ना करे, शाबर मंत्र सिद्धि की आवश्यकता नही होती वे स्वयं सिद्ध है, शाबर दीक्षा नही लेनी होती वे सीधे किताबो से पढ़कर सिद्ध किये जा सकते है। (more…)

  • शिव जी का भैरव स्वरुप : काल भैरव

    भगवान शिव मूल परम आदि शक्ति हैं ,जिनका अंशात्मक आविर्भाव भैरव स्वरुप में उद्देश्य विशेष की पूर्ती के लिए हुआ है |भैरव स्वरुप की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कथानुसार –एक बार सुमेरु पर्वत पर बैठे हुए ब्रम्हाजी के पास जाकर देवताओं ने उनसे अविनाशी तत्व बताने का अनुरोध किया।

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  • समय के साथ त्योहारों का बदलता स्वरुप।

    वर्षा ऋतू की विदाई के साथ हरी भरी प्रकृति और शीत ऋतू की सुनाई देने वाली दस्तक के बीच त्योहारों का जो सिलसिला शूरू होता है वह शीत ऋतू की विदाई के साथ ही खत्म हो पाता है | लेकिन वक्त के साथ हमारे इन त्योहारों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है | सही अर्थो में यह बदलता स्वरूप हमे त्यौहार के सच्चे उल्लास से कही दूर ले जा रहा है |

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